नई दिल्ली : कांवड़ यात्रा के मार्ग पर खाने पीने की दुकानों पर संचालक मालिक का नाम लिखने के योगी सरकार के आदेश पर सियासत तेज हो गई है। जहां विपक्ष इसे सामाजिक सौहर्द बिगाड़ने वाला फरमान बता रहा है। वहीं, सत्ता पक्ष इसे आस्था की शुचिता बनाए रखने वाला कदम बता रही है। इसी मुद्दे पर इस हफ्ते ‘खबरों के खिलाड़ी’ में चर्चा हुई।
बीते सप्ताह उत्तर प्रदेश सरकार का एक आदेश चर्चा में रहा। पहले यह आदेश केवल उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के लिए था, लेकिन बाद में इसे राज्यभर में लागू कर दिया गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि पूरे यूपी में कांवड़ मार्गों पर खाने पीने की दुकानों पर संचालक मालिक का नाम और पहचान लिखना होगा। ऐसा ही आदेश उत्तराखंड में हरिद्वार पुलिस प्रशासन ने भी जारी किया है।
इस पूरे मामले में सियासत भी हो रही है। विपक्ष इसे सामाजिक सौहर्द बिगाड़ने वाला फरमान बता रहा है। वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार फैसले को कांवड यात्रियों की आस्था की शुचिता बनाए रखने वाला कदम बता रही है। इसी मुद्दे पर इस हफ्ते ‘खबरों के खिलाड़ी’ में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार समीर चौगांवकर, विनोद अग्निहोत्री, अवधेश कुमार, पूर्णिमा त्रिपाठी, हर्षवर्धन त्रिपाठी और बिलाल सब्जवारी मौजूद रहे।
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पूर्णिमा त्रिपाठी: इस आदेश की जो भूमिका है उस वजह से यह विवादास्पद हो जाता है। इसके पीछे की मंशा देखनी होगी। इसमें कोई बुराई नहीं है कि दुकानदार अपनी दुकान के आगे नाम लिखें। लेकिन, इसके पीछे जो भूमिका बनाई गई वह गलत है। इससे दोनों समुदायों में वैरमन्स्यता ही बढ़ेगी।
अवधेश कुमार: मैं उस जगह से आता हूं जहां आज भी हमारे घर के सामने ताजिया आता है। परिवार की माताएं बहनें उसकी आरती करती हैं। हमारे यहां पूजा पाठ की एक प्रक्रिया होती है। कांवड़ यात्रा में जो लोग गए हैं उनका ध्यान रखना सबकी जिम्मेदारी होती है। उपभोक्ता के तौर पर भी यह जानना हमारा अधिकार है कि हम जो खा रहे है वह कैसे बना है। इसे मुद्दा बनाने वाले समाज में विभाजन पैदा कर रहे हैं। यह आदेश सात्विक्ता बनाए रखने के लिए है।
हर्षवर्धन त्रिपाठी: सिर्फ सावन में ही क्यों? सिर्फ कांवड़ियों के मार्ग पर ही क्यों? मुझे लगता है कि यह आदेश पूरे देश में और पूरे सालभर के लिए लागू किया जाना चाहिए। जब आप किसी होटल में जाते हैं तब क्या वहां काम करने वाले नाम का बिल्ला लगाए रहते हैं। पहचान बताने से क्या परहेज? जब पहचान छुपाकर कोई काम होता है तो दिक्कत है। यह नियम बहुत पहले से लागू है। यह नियम सालभर लागू होना चाहिए। पहचान छुपाकर कोई काम नहीं होना चाहिए।
समीर चौगांवकर: कांवड़ियों का जो खानपान है उसकी सुचिता बनाए रखने के लिए यह काम किया। जिस होटल में जा रहे हैं वो शुद्ध शाकाहारी है की नहीं यह जानना उनकी सुचिता बनाए रखने के लिए जरूरी है। ये कहीं नहीं कहा गया है कांवड़िये कहां जाएंगे और कहां नहीं जाएंगे। मुझे लगता है कि यह आदेश ठीक है। कांवडियों को किसी तरह की तकलीफ नहीं हो भ्रम नहीं हो उसके लिए यह आदेश दिया गया है। माहौल खराब करने की कोशिश करने वाले पर भी नजर रखने के जरूरत है।
बिलाल सब्जवारी: इस आदेश के तीन पहलू है। पहला धार्मिक, दूसरा कानून व्यवस्थ्था और तीसरा राजनीतिक पहलू। धार्मिक आधार पर यात्रा की सुचिता बनाए रखना सही है। लेकिन इस विवाद को खड़ा करने वाले राजनीतिक दलों की बात कहेंगे तो एनडीए के सहयोगियों ने भी इस पर सवाल उठाए हैं।
विनोद अग्निहोत्री: यह यात्रा हजारों साल से चल रही है। हर क्षेत्र में लोग जाते हैं। बनारस से रामेश्वरम तक में यह यात्रा चलती है। मुजफ्फरनगर में यह आदेश लागू हो गया। क्या अब यह रामेश्वरम में भी लागू होगा। हमारे देश में एक परंपरा है जाति न पूछो साधु की। यह एक तरह का दरार डाले की कोशिश है। जो वीडियो घूम रहे हैं उनकी क्या प्रमाणिकता है। मुझे लगता है कि ये सभी प्रश्न बहुत ही संवेदनशीलता के साथ देखे जाने चाहिए।




